
प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों की विषम भौगोलिक और जलवायु संबंधी प्रतिकूलताओं केे कारण इन क्षेत्रों में विकास संबंधी गतिविधियां चुनौतियों से भरी रहती है। लाहौल-स्पीति, किन्नौर, पांगी और भरमौर जैसे दुर्गम, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम आबादी, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और लंबे समय तक रहने वाली बर्फबारी विकास कार्यों तथा जनसेवाओं की पहुंच को चुनौतीपूर्ण बनाती रही हैं। वर्तमान में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार ने जनजातीय विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना, आजीविका, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42.49 प्रतिशत हिस्सा हैं जबकि यहां केवल 3.92 लाख लोग रहते हैं जो प्रदेश की कुल आबादी का 5.71 प्रतिशत हैं। इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व मात्र सात व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है जबकि प्रदेश का औसत 123 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद राज्य सरकार ने सभी स्थायी और मौसमी जनजातीय बस्तियों में शत-प्रतिशत विद्युतीकरण और सुरक्षित पेयजल सुविधा सुनिश्चित की है। जनजातीय क्षेत्रों का लिंगानुपात भी प्रति एक हजार पुरुषों पर 1,018 महिलाएं है जो राज्य के औसत 972 से कहीं बेहतर है।
जनजातीय क्षेत्रों के विकास को प्रमुख्ता प्रदान करते हुए सरकार हर वर्ष अपनी विकास योजनाओं के कुल बजट का नौ प्रतिशत हिस्सा ट्राइबल सब-प्लान (एसटीपी) के तहत निर्धारित करती है जो अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक है। वर्ष 2024-25 में एसटीपी के तहत 890.28 करोड़ रुपये और 2025-26 में 638.73 करोड़ रुपये अनुसूचित जनजाति घटक के लिए आवंटित किए गए हैं।
सरकार जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान कर रही है। वर्ष 2025-26 में 3,361 विद्यार्थियों को प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति, 5,693 विद्यार्थियों को पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति तथा 304 मेधावी छात्रों को मेरिट छात्रवृत्ति प्रदान की गई। प्रदेश में संचालित चार एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में 1,008 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और यहां के छात्र आईआईटी, मेडिकल कॉलेज, आईआईएसईआर सहित देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में प्रवेश प्राप्त कर प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में छात्रावास, पुस्तकालय और शिक्षकों के आवास जैसी सुविधाओं का भी तेजी से विस्तार किया जा रहा है।
जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का भी व्यापक विस्तार हुआ है। यहां दो जिला अस्पताल, छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 49 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 123 स्वास्थ्य उपकेंद्र सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। इसके अलावा 568 आंगनवाड़ी केंद्र मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा पोषण सेवाएं उपलब्ध करवा रहे हैं, जिनसे 5,084 लाभार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। राज्य सरकार की एक बड़ी उपलब्धि लाहौल-स्पीति और भरमौर में आदर्श स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना है। इन संस्थानों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी आधुनिक जांच सुविधाओं, अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं तथा प्रशिक्षित नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ की उपलब्धता से दूरदराज के लोगों को अब बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं घर-द्वार के निकट ही सुनिश्चित हो रही हैं।
सरकार जनजातीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है। मुख्यमंत्री कृषि संवर्धन योजना के तहत वर्ष 2025-26 में 9,000 क्विंटल प्रमाणित बीज और 3,200 मीट्रिक टन उर्वरक लगभग 197.05 लाख रुपये की लागत से वितरित किए गए। पिछले तीन वर्षों में 815 जनजातीय युवाओं को ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से प्रशिक्षण दिया गया, जिनमें से 577 युवाओं ने रोजगार प्राप्त किया या स्वयं का व्यवसाय स्थापित किया। इसके साथ-साथ 2025-26 के दौरान 6,576 अनुसूचित जनजाति युवाओं ने रोजगार कार्यालयों में अपना पंजीकरण करवाया है।
महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए स्वयं सहायता समूहों और विभिन्न आजीविका कार्यक्रमों के माध्यम से 3,234 महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। इसके साथ ही पात्र महिलाओं को इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत प्रतिमाह 1,500 रुपये की वित्तीय सहायता भी प्रदान की जा रही है, जिससे उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिली है।
राज्य के 75 वर्षों के इतिहास में पहली बार स्पीति घाटी के काजा में हिमाचल दिवस का आयोजन किया गया। इस आयोजन के माध्यम से जनजातीय क्षेत्रों तक शासन की पहुंच को सुनिश्चित किया गया और समावेशी विकास की प्रतिबद्धता का संदेश दिया गया।
जनजातीय क्षेत्रों में आधारभूत संरचना के विकास को गति देने के लिए शिक्षकों के लिए आवासीय परिसर, सिविल अस्पताल, आंगनवाड़ी केंद्र, सम्मेलन-सह-पुस्तकालय भवन, जनजातीय संग्रहालय, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के छात्रावास तथा लदारचा पर्यटन पार्क एवं कॉम्प्लेक्स जैसी अनेक परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इन परियोजनाओं से पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा मिल रही है।
सरकार जनजातीय क्षेत्रों में सतत आजीविका को बढ़ावा देने के लिए पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा पर विशेष ध्यान दे रही है। होम-स्टे स्थापित करने, उनका विस्तार करने अथवा उन्नयन के लिए पांच करोड़ रुपये तक के निवेश पर पांच प्रतिशत ब्याज अनुदान दिया जा रहा है, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। इसी प्रकार राजीव गांधी स्वरोजगार स्टार्ट-अप योजना के तहत निजी भूमि पर 100 किलोवाट से दो मेगावाट तक की सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित करने के लिए भी पांच प्रतिशत ब्याज अनुदान उपलब्ध करवाया जा रहा है।
पांगी घाटी को प्रदेश का पहला प्राकृतिक खेती उपमंडल घोषित कर एक नई पहल की गई है। पांच करोड़ रुपये के रिवॉल्विंग फंड और प्राकृृतिक रूप से उगाई गई जौ के लिए 80 रुपये प्रति किलोग्राम के न्यूनतम समर्थन मूल्य ने यहां रसायन-मुक्त और जलवायु-अनुकूल खेती को नई दिशा दी है।
दुर्गम जनजातीय क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए भारतनेट परियोजना के तहत 3,793 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाई गई है, जिससे 705 ग्राम पंचायतें डिजिटल नेटवर्क से जुड़ चुकी हैं। इससे ई-गवर्नेंस, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा और बैंकिंग सेवाएं अब गांव-गांव तक पहुंच रही हैं।
धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत प्रदेश के 10 जिलों के 270 गांवों का चयन किया गया है। 17 मंत्रालयों द्वारा 25 विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से इन गांवों में समग्र विकास सुनिश्चित किया जा रहा है। इस अभियान के तहत हर घर नल से जल, भारतनेट कनेक्टिविटी, एलपीजी गैस की पहुंच तथा विभिन्न आधारभूत सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया गया है।
राज्य सरकार विकास के साथ-साथ जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण को भी समान महत्व दे रही है। जनजातीय संग्रहालयों, सामुदायिक पुस्तकालयों और सांस्कृतिक अधोसंरचना को सुदृढ़ किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक खेती और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद हिमाचल प्रदेश ने यह साबित किया है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवेदनशील प्रशासन और दूरदर्शी योजनाओं के माध्यम से विकास की रोशनी प्रदेश के दुर्गम गांवों तक पहुंचाई जा सकती है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, आधारभूत ढांचे, पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल कनेक्टिविटी और सतत आजीविका के क्षेत्र में किए जा रहे निवेश से जनजातीय समुदायों का जीवन स्तर बेहतर हुआ हैं। प्रदेश सरकार उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए समावेशी और संतुलित विकास को बढ़ावा दे रही है। जनजातीय विकास का हिमाचली मॉडल देश के सामने एक प्रेरक उदाहरण स्थापित कर रहा है।
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